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         पार्थ भगत


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युद्ध : पराक्रम, प्रतिशोध और परिणाम के शोध में पुनर्जीवन की क्षति

  जो लोग मुझे व्यक्तिगत तौर पर जानते हैं, वे शायद मेरी इस विचारधारा से शंकित होंगे, कि वीर और औज रस से प्रभावित मेरी कलम क्या इस तरह का भी कुछ लिख सकती है? मेरी कलम ने सुख- दुःख, आक्रोश, पीड़ा, सौहार्द्य इत्यादि भाव प्रस्तुत किए है लेकिन कभी युद्ध का प्रोत्साहन नहीं किया है।  वीर रस के आवेग में यह कहना और प्रोत्साहित करना बहुत आसान है की दुश्मन से युद्ध करो, युद्ध ही वीर का प्रमाण है। किंतु क्या वीरता और पराक्रम सिर्फ युद्ध तक सीमित है या सच्ची वीरता का प्रारब्ध क्षमा और शांति में निहित है।  आदि काल से "अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च: "   जैसे संस्कृत श्लोको को लोगो ने अपने हिसाब से अर्थ निकालकर खूब परोसा। जब हजारो, लाखो लोग मर रहे थे, धर्म-समाज और देश को भीषण अग्नि में जलाया जा रहा था तब किसी ने श्लोक के अग्रिम आधे भाग को गौरव से पेश करते हुए सिर्फ अहिंसा का मार्ग प्रशस्त किया, वही सत्तावासना के चरमपंथी मोह में एवं गुटबंदी के अति उत्तेजित इरादों के चलते कुछ लोग पिछले आधे भाग को भी पेश करते रहना नहीं भूले। इस वाक्य से लोगो ने हिंसा को भी जायज ठहराया तो कुछ ने अह...

हम आगे बढ़ते जाएंगे

  हम आगे बढ़ते जाएंगे हम कालिका के लाल सकल, रज-रज मे हमारी गाथा हो  हम समाज का वो पौधा बनें  जो सुन्दर पुष्प खिलाता हो प्रयास हो हमारा  हम समाज का मान बनें  लिखे इतिहास हम हमारा  समाज की पहचान बनें  अब समाज के मान गौरव का भार हमारे कंधो पे  हो कठिनाईयों से लडने का साहस हमारे हाथों में  सफलता हासिल करे हम किसी भी विषय की पढाई मे पर मानवता हो धर्म हमारा  न छूटे किसी कठनाई में  आशीष, कमल जी हमारी  आशाओं की परिभाषा है  परिश्रम और संकल्प  हमारी सफलता की भाषा है आत्मविश्वास हे हमें  हम सफलता के शिखर पर जाएंगे  मेहनत और कर्मठता से हम स्वंय की पहचान बनाएंगे  संकल्प करना है हमको हम समाज मान बढ़ाएंगे  खूब पढ आगे बढ़ेगे  नया इतिहास रचनाएंगे  हम विवेक से काम करेंगे  सफलता को ही लक्ष्य बनाएंगे  इसी संकल्प को मन मे लिये  हम आगे बढ़ते जाएंगे    पंकज पंवार   केसरी कलम                 

स्वावलम्बन

  स्वावलम्बन प्रातः काल में प्रथम स्मरणीय , स्पर्शनीय मोबाइल ज्यों ही हाथ में आया तो 5 सितम्बर (शिक्षक दिवस) के पुनित अवसर पर प्रतिपल दर्शनीय वाट्सऐप व फेसबुक को   परिचित , अपरिचित शुभचिंतकों के शुभकामना संदेशों से भरा पाया। जीवन में अच्छी जगह की हसरत में लघु अध्यापन काल में भी कई विद्यालयों की खाक झानने के कारण हुए अनुभव , परिदृश्यों का एक चलचित्र मनोमस्तिष्क में ऐसा चला कि विचारों का काँरवा उस मनहूस दिवस पर आ ठहरा , जहाँ अपने परिवार और बच्चों के भविष्य की खातिर अपनी फितरत से इतर होकर जल्लात के घुट पीकर समझौतावादी बनना पडा था I आज हर स्कूल की दीवार का   वह कोटेशन साफ दिखाई पड रहा था , जिस पर लिखा हुआ था- “शिक्षक वह दीपक है , जो स्वयं जल कर दूसरों को रौशनी देता है। “   उस दिन से पहले तक मैनें राग-द्वेष , छल , कपट , ईष्र्या , निन्दा आदि दुर्गुणो विहिन विशुद्ध शिक्षक की भूमिका का निर्वहन करते हुए ज्ञान दान का महा पुनित कार्य किया है। उस शिक्षक दिवस को अभिनव सोच , सकारात्मक विचारों के प्रणेता , अति महत्वाकांक्षी   प्रधानाचार्य जी ने सभी स्टाफ साथियों को वृ...